हमारे घरों में अब मेहमां पुराने नहीं आते,
परिंदे भी अब घोसले बनानें नहीं आते
जबसे रुख किया है इस शहर का हमने,
अलसुबह भी ख्वाब सुहाने नहीं आते
सावन का महीना या नवरात्र हो चाहे,
अब मंदिर नहीं जाते शिवाले नहीं जाते|
चाँद तारे रातों को मुंडेर पर साथ सोते थे,
अरसा हुआ हम छत पर सोने नहीं जाते |
अरसा हुआ हम छत पर सोने नहीं जाते |
यारों से मिल बैठे हुए अरसा बीत गया,
कुछ हम नहीं जाते कुछ वो नहीं आते
लोग तो बहुत आते है अब जिंदगी में
पर उन जैसे दोस्त दीवाने नहीं आते
क्या पाया हमने गावों को छोड़कर,
माँ बाप भी शहर में मिलने नहीं आते |
माँ बाप भी शहर में मिलने नहीं आते |
©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"