Thursday, December 13, 2012

मैं और मेरी ये तन्हाई

पिछले दिनों ग़जल लिखने की एक और कोशिश की, पेश-ऐ-खिदमत है 

दीवारों से बातें करती, मैं और मेरी ये तन्हाई 
ये बरस भी बीता जाये, उसकी कोई खबर न आई |

सावन की भीगी रातो को, जैसे तेसे काटा मैंने 
कोहरे की जब बदली छाई, और भी मुझको वो याद आई |

पहले "मौन" भी पत्थर दिल था, दीवानों पर हंस देता था
खुद को यूँ दीवाना पा कर, मेरी आँखें भी भर आई |

उसको भूल पाने की, कोशिश करना बेमानी है 
घर में मेरे शीशे बहुत है, सबमें उसकी ही परछाई |