दो शब्द मातृभाषा के नाम

यह लेख मैंने नवम्बर 2012 में लिखा था जो की राजभाषा कार्यान्वयन समिति की वार्षिक पत्रिका में कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित हुआ है |

हिंदी के परिरक्षण में माता-पिता की भूमिका
लोकेश ब्रह्मभट्ट
क्षेत्र प्रबंधक, भारतीय खाद्य निगम,
बंगाईगांव (असम)
भारतवर्ष का इतिहास अत्यंत उज्जवल रहा है | विश्वगुरु एवं सोने की चिडिया कहलाने वाला ये देश एक समय में अपनी ये अलग पहचान मात्र इसकी संस्कृति एवं जीवन पद्दति के बल पर ही बना पाया था | परन्तु आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान खोती भारतीय संस्कृति एक बहुत बड़ा चिंता का विषय है | हिंदी मात्र एक भाषा नहीं है वो हिंदुस्तान की इसी संस्कृति और जीवन पद्दति का प्रतीक है | आज भारत और भारतवासी पुरे विश्व में अपनी प्रतिभा और ज्ञान का परचम लहरा रहे है, परन्तु सवाल ये है की उनमे से कितने लोग तन और मन दोनों से भारतीय है | और यदि नहीं है तो इसके पीछे किसकी भूमिका है ? ये प्रश्न हर भारतीय को अपने आप से करने चाहिए |
संस्कृति के प्रमुख प्रतीकों की चर्चा करें तो उनमे भाषा का स्थान प्रमुख है एवं उसके बाद भोजन, वस्त्र, पूजा पद्दति, रहन सहन इत्यादि आते है | आज की पीढ़ी की यदि बात करें (चाहे वो निवासी भारतीय हो या प्रवासी भारतीय) तो इनमे से प्रमुख प्रतीक भाषा को लगभग भूला दिया गया है | कहने को तो अन्य प्रतीक यथा भोजन, वस्त्र आदि की हालत भी किसी से छिपी नहीं है परन्तु भाषा के बारे में यहाँ मुख्य रूप से मैं वर्णन करना चाहूँगा | भारतीय संस्कृति भाषाओ के मामले में अत्यंत समृद्ध रही है एवं यहाँ पर लगभग हर प्रान्त की एक अलग भाषा है एवं उनमे से प्रत्येक भाषा बोद्धिक एवं साहित्यिक स्तर पर अपनी पहचान रखती है | लगभग सभी भाषाओ (जो की संविधान की आठवी सूची में अनुसूचित है) में अध्ययन हेतु पाठ्यक्रम एवं विद्यालय भी उपलब्ध है | मुख्यतः हिंदी जो की भारत के सबसे बड़े भूभाग एवं सबसे ज्यादा लोगो द्वारा बोली जाने वाली भाषा है उसमे तो उच्च अध्ययन हेतु भी समस्त सुविधा उपलब्ध है, इसके पश्चात् भी आज लगभग सभी प्रान्तों में सभी भाषाओ पर अंग्रेजी हावी है | भाषा का ये विदेशीकरण मुख्यतः दो प्रकार का है, पहला वो जो माता पिता यानि प्रथम गुरु सिखाते है दूसरा जो शिक्षा संस्थानों में सिखाया जाता है | ये दोनों ही चिंता का विषय है अतः मैं इन दोनों को एक एक करके पाठको के सामने रखना चाहूँगा |
भाषा का प्रथम प्रकार का विदेशीकरण करने के लिए पूर्णतया पालनकर्ता यानि माता पिता जिम्मेदार है | आज ये हर घर में ये देखने को मिलता है की नवजात शिशु को जन्म से ही उसके माता पिता अंग्रेज बनाने का अभियान छेड़ देते है, उदहारण के लिए जो सबसे पहला शब्द बच्चे को सिखाया जाता है वो होता है “मम्मी” या “मोम” और दूसरा होता है “डेडी” या “डेड”, बिरले ही माँ-बाप होते है जो बच्चों को “माँ” और “पिताजी” कहना सिखाते है, और यहीं से बच्चे के अंग्रेजीकरण की शुरुआत हो जाती है और इसके लिए बच्चे के माता-पिता और मुख्यतः माता सबसे ज्यादा उत्तरदायी है | इसके बाद भी बच्चे को अंग्रेज बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती जेसे उसको “नमस्ते” या “प्रणाम” के स्थान पर “शेक-हैण्ड” या “हेलो” सिखाया जाता है फिर उसे शरीर के विभिन्न अंगो के नाम सिखाये जाते है वो भी अंग्रेजी में | आज एक दो से तीन वर्ष का बच्चा “आई”, “नोज”, “लिप्स” आदि जानता है परन्तु आँख, नाक और होंठ नहीं जानता | और संस्कृति के इस विदेशीकरण में सबसे बड़ी जिम्मेदार होती है उसकी माता, वही माता जिसको हम सहस्त्राब्दियो से प्रथम गुरु एवं भगवान् की संज्ञा देते आ रहे है | और इसके पीछे कारण होता है समाज में अंग्रेजी बोलने वालों को मिलने वाली प्रतिष्ठा | आज की लगभग हर माँ अपने बच्चों की, और अपनी स्वयं की छवि समाज में अंग्रेजी बोलने वालों के रूप में बनाना चाहती है | और इसके परिणाम केवल भाषा के विदेशीकरण तक ही सीमित नहीं रहते, वरन इसके दुष्परिणाम अत्यंत घातक सिद्ध होते है, एक समय पश्चात हमें समझ आता है की हमने अपने भारतीय होने की पहचान ही खो दी है, एवं फिर हमारी पहचान “भारतीय” न होकर “भारतीय मूल के” की हो जाती है | ये विदेशीकरण भाषा से शुरू होता है तथा संस्कार से होते हुए वस्त्रों, भोजन एवं रहन सहन को ही बदल कर रख देता है | और ये दुष्परिणाम यहाँ तक ही सिमित नहीं रहते, एक समय ऐसा आता है की अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढने वाले ये बच्चे अपने उन्ही माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों जेसे दादा-दादी आदि के साथ चलने एवं उन्हें किसी से परिचय करवाने में ही शर्म महसूस करने लगते है, क्योंकि परिवार के उन सदस्यों का रहन सहन अब भी कुछ हद तक तो भारतीय होता है | यहाँ से शुरुआत होती है हमारी संस्कृति के पतन की और अस्तित्व हनन की, ये पीढ़ी जब कहीं भी भारत का प्रतिनिधित्व करती है तो न तो उसमे भारतीय होने का कोई गौरव महसूस करती है और न ही उनके आचरण से भारतीय होने की कोई छवि परिलक्षित होती है |
भाषा का दुसरे प्रकार का विदेशीकरण उच्च शिक्षण संस्थानों में पढाये जाने वाले अंग्रेजी माध्यम से प्रेरित होता है | भारतीय संस्कृति सहस्त्राब्दियो पुरानी है एवं प्राचीन काल से ही गुरुकुल के रूप में यहाँ शिक्षा का स्वरुप बहुत ही समृद्ध रहा है | यहाँ धर्म एवं अध्ययन साथ साथ चलता रहा है एवं प्रत्येक ऋषि-मुनि और गुरु अपने आप में एक साहित्यकार, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री अथवा गणितज्ञ रहे है | संसार की सबसे बड़ी-बड़ी खोजें एवं अविष्कार यहाँ हुए है, परन्तु विडम्बना ये रही की हमारा ये ज्ञान समृद्ध देश सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों का उपनिवेश रहा एवं एक सोची समझी रणनीति के तहत हमारे यहाँ से वो समृद्ध शिक्षा प्रणाली लगभग समाप्त कर दी गयी | आज उन्हीं ऋषि मुनियों के लिखे हुए अधिकतर ग्रन्थ यथा धन्वन्तरी का आयुर्वेद, चाणक्य का अर्थशास्त्र, चरक संहिता, एवं सुश्रुत संहिता आदि विकसित देशों के सभी बड़े विश्वविद्यालयों में ज्ञान का स्त्रोत बने हुए है परन्तु हमारा भारतवासी ही उनसे अनभिज्ञ है | हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओ में उच्च शिक्षा हेतु पुस्तकों एवं लेखकों की अत्यंत कमी है और हम मजबूर हो चुके है शिक्षण के लिए अंग्रेजी में लिखी हुई पुस्तकों को मानक पुस्तकें मान कर पढने के लिए | उच्च माध्यमिक शिक्षा तक तो फिर भी कुछ राज्य हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओ को बराबर का दर्जा देते हुए उनका पाठ्यक्रम चला रहे है, परन्तु स्नातक स्तर पर यदि आप किसी तकनिकी शिक्षा में प्रवेश लेना चाहते है तो हिंदी का त्याग करना विद्यार्थी की मज़बूरी बन जाती है और ऐसा इसलिए नहीं है की हिंदी में परीक्षा देने की अनुमति नहीं है या हिंदी का पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है, अधिकतर विश्वविध्यालयो में प्रश्नपत्र दोनों भाषाओ में आते है तथा उत्तर भी हिंदी में दिए जाने का विकल्प होता है | परन्तु हिंदी में पढने वाले विद्यार्थी को अत्यंत हीन भावना से देखा जाता है | यहाँ तक की शिक्षक भी हिंदी में लिखी उत्तर पुस्तिकाओ को पूरा पढने तक की जेहमत तक नहीं उठाते वरन अंदाज से कुछ औसत अंक देकर आगे बढ़ जाते है | ऐसे में विद्यार्थी के पास हिंदी का त्याग कर अंग्रेजी को अपनाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता |
अब सवाल ये उठता है की क्या हिंदी का एवं अन्य भारतीय भाषाओ का ये विदेशीकरण रोक पाना संभव है ? अगर इसका उत्तर हम ढूंढने का प्रयास करें तो ये पाएंगे की जो दूसरी समस्या है (उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का प्रयोग) उसका समाधान आम आदमी के हाथ में कम एवं सरकारी तंत्र के हाथ में ज्यादा है तथा उसके लिए सरकार, जनता, वैज्ञानिक, साहित्यकार, शिक्षाविद, नौकरशाह, सभी को एक साथ मिल कर आगे आना होगा एवं एक सम्मिलित अभियान युद्ध स्तर पर चलाना होगा |
परन्तु कम से कम प्रथम प्रकार की समस्या का समाधान तो हमारे घर में ही उपलब्ध है | हम सब यदि ये प्रण करें की अपने घर परिवार के बच्चों को पहले हिंदी सिखायेंगे फिर बेशक उसका अंग्रेजी में अनुवाद भी सिखाएं, परन्तु ये बताना न भूले की अपनी मातृभाषा हिंदी (या अन्य क्षेत्रीय भाषा) है एवं जहा तक आवश्यक न हो हमें विदेशी भाषा का उपयोग न करके हमारी मात्रभाषा का उपयोग करना है तो वो दिन दूर नहीं जब हम देखेंगे की हमारी संस्कृति और हमारा देश फिर से परम वैभव को प्राप्त करेगा एवं हम और हमारी ये हिन्दुस्तानी संस्कृति अपने खोये हुए सम्मान को पुनः प्राप्त करेगी |

जय हिंद

2 comments:

  1. Thats Great Artical Lokesh, Congrats.

    Once upon a time I was staunch follower of Hindi. But latter I came to know that system and completion would kick you out if you don’t mould yourself. I am disagree that mother should be blamed for it as she prepares her child for the future and we all know that strong foundation only can keep you growing throughout your professional life.
    The second part of your article, I am agree that this is system and govt who have to take steps to address culture demoralisation.

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  2. Thanks Jayant .. agreed with ur thoughts,,, but the human mind have a unlimited Hard-disk, I have written in the article that the mother should teach the boy Hindi first and then the english version also,,, thus the child will be expert in english but will not forget hindi,,, just like u and myself belong to hindi medium but still doing good in our professional career. but now a days the children even don't know the hindi version of very common words... this have lead to make hindi an endangered langauge, which should not happen, that was my spirit behind writing this... Lokesh

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