दो पंक्तियाँ

पिछले 2 सालों में अलग-अलग समय अलग-अलग विषय पे लिखे ये शेर यहाँ संकलित कर रहा हु,

गुस्सा, फ़िक्र और आंसू लिए देहलीज पे हाजिर देखा,
मैं जब भी घर देर से लोटा, 'माँ' को मुन्तजिर देखा |
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आखिर बदल दिया हमने मुद्दा-ऐ-तकरार ,
जब उसके तानों का, जवाब देते न बना |
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हमसे मोहब्बत करोगेपागल हो जाओगे तुम भी,
आईने से बातें करोगेशायर हो जाओगे तुम भी |
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झूठ है सब, सच्चा प्यार जीवन में एक ही बार होता है,
हमने तो "मौन", जब भी किया, दिल-ओ-जान से किया |
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हम करते रहे इकरार-ऐ-मोहब्बतवो हर बार हँसी में टालते रहे,
अब आलम-ऐ-इश्क ये है "मौन"वो भी 'काश' कहते हैहम भी 'काश' कहते है |
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एक उम्र बिता दी इंतजार में यूँ ही की वो आयेंगे वादा निभाने को 
न वो आये न खबर कोईतब कूच किया महखाने को |
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चाहकर भी तुम मुझे यूँ भूल पाओगे 'मौन', 
आती रहेगी हमको भी हिचकिया क़यामत तक |
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कातिल वही, हाकिम वही, वही मुनसिफ, वही सुलतान  |
हम उनसे इन्साफ की उम्मीद लगाये भी तो भला कैसे ?
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