Wednesday, April 1, 2020

खुदाया जिंदगी में इक दिन ऐसा हो पाता

खुदाया जिंदगी में इक दिन ऐसा हो पाता
उनकी खता होती और मैं खफ़ा हो पाता।

सारे ऐब सहकर भी तुझसे खफ़ा नहीं
इससे ज्यादा तो क्या मैं बा-वफ़ा हो पाता।

जो तेरे साथ रहकर भी खुश न रह सके
बीमार है वो शक्श काश शिफा हो पाता।

रिश्तों में नुकसान का सबब है 'मौन' रहना
गुफ़्तगू चलती रहे तब कहीं नफा हो पाता।


यूँ क्या मिलेगा मुझको टुकड़ों में मार कर।

आंखों से वो चश्मा वहम का उतार कर
तू देख मुझे फिर से नजर में उतार कर

तानों से तो तकरार में जीत मेरी तय है
एक काम कर तू यार खंजर से वार कर

ये क्या बात बात पर यूँ खफा हो जाना
तू इश्क कर रहा है तो शिद्दत से यार कर

सय्याद को क्या लेना पंछी के दर्द से
अपना मजहब निभा, तू तो शिकार कर।

वो इश्क़ का नहीं अना का मरीज है
कुछ तो इलाज उसका ए मेरे यार कर।

वफ़ा अगर हो तो  वफ़ा की मानिंद हो
जफ़ा है तो तीर सीने के आर-पार कर।

तू एक दिन ये किस्सा मुकम्मल ही कर दे
यूँ क्या मिलेगा मुझको टुकड़ों में मार कर।