Monday, April 20, 2009

My New Gazal

hi friends:
I tried to write this gajal in the extreme boring class of Retail Management, plz  have a look and if u can find some good modifications/improvements than plz tell me,

कसमे खाते थे जो साथ जीने की, और मरने की,
आहिस्ता आहिस्ता बन गए अनजान, हमें खबर न थी |

खोजते रहे राहो  में जिनको, बिछडा मीत जानकर,
वो अरसे से खड़े थे मंजिल पर,  हमें खबर न थी |

जी रहे थे जिनके सहारे,  जो रहे थे निगहबान हमारे,
वही बनेंगे हमारे कातिल, हमें खबर न थी |

डूब गए मझधार में "मौन"हम जिनको बचाने की चाह में,
वो खड़े देख रहे थे साहिल पर, हमें खबर न थी |

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन" 

जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा

एक अरसे तक वो मेरा मोहतरम रहा, जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा मैं उस दिन पहली बार माँ से झूठ बोला कईं महीनों तक मेरे दिल में ये गम रहा। म...