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Tuesday, February 1, 2022

वो अलग जमाना था।

वो अलग जमाना था जब मैं और तुम मिले थे
ये वो जमाना ही नहीं

जब मेरी दुनियाँ तेरे रुख़सार के इर्द गिर्द
ही शुरू होकर खत्म हो जाती थी
और मैं बेतहाशा दीवानगी में
हर आहट में तेरे आने का 
झूठा भरम पाल कर चोंक उठता था।
ये जानते हुए भी की तू नहीं है।
और सचमुच तेरे आने पर तो मेरा चेहरा
जैसे किसी सूरजमुखी के फूल सा 
अनायास ही तेरी और मुड़ कर खिल जाता था
जैसे तू ना हो कोई सूरज की पहली किरण निकली हो
किसी काले बादल सा काजल लगा के।

वो अलग जमाना था जब मैं और तुम मिले थे।
ये वो जमाना ही नहीं

जब तुम्हारी हर छोटी से छोटी तकलीफ पर भी
पहला हक मेरा होता था। 
फिर चाहे उसमे कितना वक्त जाया हो 
और ये जानते हुए भी की जरा सी बात है 
परंतु तुम उस राई का पहाड़ बना कर 
मुझे उसमें शामिल करने का बहाना ढूंढ ही लेती थी
और मैं भी आदतन पूरी शिद्दत से लग जाता था 
उन गुत्थियों को सुलझाने में।

वो अलग जमाना था जब मैं और तुम मिले थे।
ये वो जमाना ही नहीं

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

 

Monday, January 24, 2022

तुम्हें तो मालूम है जाना।


अब कितना टाइम है मेरे पास
जब से तुम गयी हो, 
मैं शाम को घर आकर
घंटा भर सोफे पे आराम करता हूँ
क्योंकि कोई भी तो नहीं 
जो ये कहे 
कि लो इन बच्चों को संभालो अब, 
सारा दिन मैंने संभाला है।
और मैं ये कहूँ 
की थक गया हूँ यार
आफिस में कितना काम होता है
तुम्हें तो मालूम है जाना।

बड़ी देर तक जागता हूँ मैं आजकल,
जबकि कोई नहीं है देर तक शोर मचाने वाला,
चूंकि इतने सन्नाटे का आदि नही रहा मैं अब
आदत सी हो गयी है तुम सबके शोर की
तुम्हें तो मालूम है जाना।

कहीं घर में कुछ बिखरा भी नहीं रहता अब
ना तो कोई सामान 
बेतरतीबी से रखा होता है
ना ही कोई बोतल या डब्बे का ढक्कन 
खुला मिलता है
आखिर किस चीज़ पे गुस्सा करूँ 
या चिढ़ जाऊं 
समझ नही आता
खैर चिढुंगा भी किसपे, 
तुम तो हो ही नहीं,
पर बिना गुस्सा किये 
मुझसे रहा भी तो नहीं जाता
तुम्हें तो मालूम है जाना।

और ये तुम्हारे होने की जो आदत डाल दी है तुमने
मैं अक्सर बाथरूम में 
नहाने घुस जाता हूँ बिना टॉवल लिए
और नहाने के बाद याद आता है 
कि तुम तो नहीं हो
ऐसी बहुत सी चीजें है जो अब याद नहीं रहती मुझे
तुम्हे तो मालूम है जाना।

तुम जो ऐसे चली जाती हो
एक एक दिन एक साल सा निकलता है मेरा
वैसे यूँ तो सब काम आता है मुझे
पर बिना तुम्हारी रोकटोक के 
हर काम बोरिंग लगता है
और मुझे बोरियत बिल्कुल पसंद नहीं। 
तुम्हें तो मालूम है जाना। 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए

लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए  दिलों में दर्द मेरी आँखों में समंदर आए  कितनी मुद्दत से हैं उम्मीद में दहलीज़ मेरी तू अपने पाँवों से इसे ...