लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए
दिलों में दर्द मेरी आँखों में समंदर आए
कितनी मुद्दत से हैं उम्मीद में दहलीज़ मेरी
तू अपने पाँवों से इसे छूकर अंदर आए।
तू जो आए तो इसे चैन आ जाये आख़िर
यूँ तो इस दर पर कईं पीर कलंदर आए
आना ना आना ये तो फिर मर्जी है तेरी
मगर आए तो फिर दिल के अंदर आए
वो जो प्यार मांगने आया है तेरे दर पर
उसके दर हाथ फैलाये कईं सिकंदर आए
©लोकेश ब्रह्मभट्ट ("मौन" लोकेश)