Friday, January 17, 2020

कौन बड़ी बात है


इश्क़ में झूठी कसमें खाना कौन बड़ी बात है
वादा करके भूल जाना कौन बड़ी बात है 

बुलंदियों पर बैठे है और सारा दहर साथ है,
ऐसे में तेरा लौट के आना कौन बड़ी बात है ।

तू ग़म में चला आता तो कोई बात भी थी,
खुशियों में शरीक होना कौन बड़ी बात है ।

बस्ती बस्ती फिरता हूँ मैं तेरी एक तस्वीर लिए,
इश्क़ में यूं दीवाना होना कौन बड़ी बात है।

तुम अपने ख्वाब भी किसी के नाम करो तो मानें,
इश्क़ में "मौन" जाँ दे देना, कौन बड़ी बात है ।

लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

दहर=world

शायद

वो शक्श चाहता भी यही था शायद
हमारा बिछड़ना भी सही था शायद।

उसकी आँखों ने बहुत रोका मुझको
मैं दिल से चाहता भी यही था शायद।

यूँ तो सहरा में हरियाली नहीं दिखती
वो सहरा सहरा ही नहीं था शायद।

हिज़्र कोई शोक नहीं मजबूरी थी
ये कोई इरादतन तो नहीं था शायद।

अफसोस कि उस कॉफी का कर्ज न अदा हुआ
दरअसल ये मुमकिन भी नहीं था शायद।

वो इख्लास, वो खुलूस, वो इफ्फत और ये इज्तिरार
"मौन" तू उसके लायक ही नहीं था शायद।

लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Saturday, September 7, 2019

चंद्रयान-२

क्या हुआ जो चाँद पर पहुंचे नहीं
ये क्या कम है कि हम
चाँद की दहलीज जाकर
उसके दरवाजे पे अपनी
दस्तक देकर आये है |
ग्यारह वर्षों के परिश्रम
के स्वेद की चंद बूंदे
मंजिल पर गिरा कर आये है |

चाँद रिश्ते में भी है मामा हमारा 

वहां जाना पैदाइशी हक़ हमारा
आज गिरे है कल उठेंगे
फिर चलेंगे और एक दिन
कर लेंगे फतह
हम वो सतह
आज जिसके पास जाकर आये है |

चाँद पर उतरे नहीं पर 

चाँद फतह तो कर लिया
इस कदर समर्पण से तुमने
दिल फतह तो कर लिया
राष्ट्र गौरव के. सिवन तुम
रुक न जाना राह में
तुमने ऐसे कितने पंछी
मंजिल तक पहुचाये हैं |

Sunday, July 28, 2019

मौत तो तय थी...

(मेरे मोहतरम दोस्त और वरिष्ठ साथी स्वर्गीय श्री सुशील शर्मा जी, सहायक महाप्रबंधक (सिविल), FCI और कैंसर से उनके अतुलित संघर्ष को समर्पित) 


मौत तो तय थी, लोगों को जीना सिखा गया वो,

हर एक पल में एक जिंदगी, बिता गया वो |

किश्ती बढती रही, साहिल की ओर दिन-ब-दिन,

हवाओं को बहने का हुनर सिखा गया वो |

मलकुल-मौत से कह दो की इजाजत लेकर आये,

यूँ मौत को भी मिलने का सलीका सिखा गया वो |

अंग-अंग बेवफाई करता रहा बारी बारी,

अंग अंग से लड़ता रहा और जीता गया वो |

मौत आखिर मौत थी, जीत गयी एक दिन,

पर जब तक जिया, मौत से जीता किया वो | 

Friday, June 28, 2019

तुम कहते तो सही (28/06/2019)

लड़ तो हम खुदा से लेते, तुम कहते तो सही|
सारे जग से बैर ले लेते तुम कहते तो सही|

जग से न हारे थे हम, हारे तुम्हारी ख़ामोशी से 
जीत ना लिया होता जहाँ, तुम कहते तो सही |

तुम भी कौनसे इस कदर खामोश-मिजाज थे,
हम भी पर्दा-ए-हया हटा देते, तुम कहते तो सही|

हज़ारों कोशिशें की तुमने, तर्के-वफ़ा की हमसे,
हम खुद ही चल दिए होते, तुम कहते तो सही |

लब न खोलते तुम, कुछ इशारा ही कर देते,
हम भी न “मौन” रहते, तुम कहते तो सही |

उसकी यादों ने मगर पीछा नहीं छोड़ा | (written on 07/03/2018)

जिस महफ़िल में तय था, बेआबरू होना,
हमने उस महफ़िल में भी जाना नहीं छोड़ा |

मुफलिसी में अमीरी की लत छोड़ दी लेकिन,
हमने गैरत नहीं छोड़ी ईमाँ नहीं छोड़ा |

वो छोड़ गया हमको, मझधार में तन्हा,
साहिल पे भी हमने जिसे तन्हा नहीं छोड़ा |

एक-एक कर छोड़ चले सब, राह-ऐ- हयात में,
बस माँ की दुआओं ने कभी दामन नहीं छोड़ा |

घर, गली, कूचा, गाँव, सब छोड़ दिया लेकिन,
उसकी यादों ने फिर भी मगर पीछा नहीं छोड़ा |

बरसों हुए सूखे हुए, फूलों को किताबों में,
फूलों ने फिर भी मगर महकना नहीं छोड़ा |

Wednesday, June 6, 2018

पिता

जो बेटा परदेश गया था 
रोशन करने नाम पिता का,
उसने वापस मुड के न देखा
पीछे क्या है हाल पिता का।
वो पथराई बूढी आँखें
रस्ता तकती बेटे का,
कहाँ गया वो आँख का तारा
कहाँ गया वो लाल पिता का ।।

बीमारी से झरझर काया
उमर ने अपना रूप दिखाया,
सूनी घर की चारदीवारी
हाल पूछने कोई न आया।
जब जब घर से बाहर निकले 
वो ऐसी मजबूरी में,
आस पड़ोसी सारे पूछे 
ऐसा क्यों है हाल पिता का ।।

सारा जीवन जिसकी खातिर
उसने सारे सुख बेचे,
खुद भूखा रह मुफलिसी में
जिसको सारे सुख सौंपे।
अंतिम पल में शरशय्या पर
लेटा लेटा सोचे बाप,
क्या मुझको वो कांधा देगा,
या होगा अपमान पिता का।।

फोन आना बंद हुए और
खेर खबर भी न आई,
उसके आने की उम्मीदें भी
टूटती नजर आई |
क्या खोया और क्या पाया की 
उधेड़बुन में आखिरकार,
यही नतीजा निकल के आया,
यही लिखा है भाग्य पिता का।