Thursday, July 2, 2026

लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए

लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए 

दिलों में दर्द मेरी आँखों में समंदर आए 


कितनी मुद्दत से हैं उम्मीद में दहलीज़ मेरी

तू अपने पाँवों से इसे छूकर अंदर आए।


तू जो आए तो इसे चैन आ जाये आख़िर 

यूँ तो इस दर पर कईं पीर कलंदर आए 


आना ना आना ये तो फिर मर्जी है तेरी 

मगर आए तो फिर दिल के अंदर आए 


वो जो प्यार मांगने आया है तेरे दर पर 

उसके दर हाथ फैलाये कईं सिकंदर आए 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट ("मौन" लोकेश) 

Saturday, June 13, 2026

मर्द

मर्द का अपना कोई सपना  नहीं होता 

वो जीता रहता है अपनों की जिंदगी 

और उनके सपने,

बचपन से जवानी तक पूरे करता है 

माँ बाप के सपने, 

फिर पूरे करता है बीवी के अरमान 

और उसकी महत्वकांक्षाओं को, 

पूरी करता है बच्चों की ख्वाहिशें, 

और जीता हैं उनकी ख़ुशीयाँ

भूल जाता है इतने सब में 

की कुछ सपने उसके भी थे कभी,

कोई बकेट लिस्ट बनायी थी उसने भी,

कईं शौक थे उसके जो बचा कर रखे थे 

की जब कमाने लगेंगे तब पूरा करेंगे,

जब कमाने लगा तो पूरा करता रहा 

बीवी-बच्चों की जरूरतें, 

उनके शौक उनके सपने, 

और इन्ही सब में गुम हो गए उसके ख़्वाब 

जो पूरे ना हो पाये कभी,  

मर्द का अपना कोई सपना नहीं होता । 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट ("मौन" लोकेश)


लोग

कहाँ कहाँ से आते हैं ये जाने वाले लोग 

दिल में बसकर दिल को दुखाने वाले लोग 


मिले हैं लाखों लोग जिंदगी के सफ़र में 

पर वो इक्के दुक्के साथ निभाने वाले लोग 


यूँ तो बहुत लोग है रूठने वाले हमसे 

हमे चाहिए हम रूठें तो मनाने वाले लोग 


सब दोस्तों में चराग लेकर ढूँढ रहा हूँ मैं 

वो मुसीबत में मेरा फ़ोन उठाने वाले लोग 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट ("मौन" लोकेश)

दोगले जानवर

रंग बिरंगे पंखों वाली तितलियाँ 

सौंदर्य का प्रतीक हैं 

इन्हें मारना बेरहमी और क्रूरता की निशानी है। 

इन्हीं तितलियों का बचपन यानी लार्वा 

बदसूरत और गंदा कीट । 

घिन आती है उसे देखकर भी । 

उसे मारने के लिए 

कीटनाशक ईजाद किए गयें हैं ।

इन्हें मारने के आर्गेनिक तरीकों पर  

रिसर्च हो रही है । 


किसी कॉकरोच को चप्पल से कुचल देना 

वीरता की निशानी हैं ।

पर किसी जुगनूँ को मार देना निर्मम हत्या है । 

अमानवीय हैं ।


चिड़ियाँ, मैना, गिलहरी जैसे जीव 

कितने सुंदर और मासूम हैं । 

इन्हें बचाने के लिए अभियान चलाए जा रहें हैं ।

वहीं कोवे अपने काले रंग 

और छिपकलियाँ अपनी बदसूरती की 

सजा भुगत रहें है ।


हम इंसानों की नैतिकता के पैमाने 

रंग और सौंदर्य देख कर तय होते हैं ।

हम इंसान दोगले जानवर हैं ।

©लोकेश ब्रह्मभट्ट ("मौन" लोकेश)

Monday, March 2, 2026

शुक्रिया अदा करो

खुदा की किस क़दर इनायत है शुक्रिया अदा करो 

हम और तुम उसी की बनावट है शुक्रिया अदा करो


ये जो दुख भरी जिंदगी है जिसका तुम्हें मलाल है 

ये लाखों लोगों की इबादत है शुक्रिया अदा करो


ये जो तुम्हें मेरी हर बात से नाखुश रहने की आदत है  

ये इश्क़ नहीं है ये शिकायत है शुक्रिया अदा करो


तुम्हें ये कैसा मलाल है की तुम्हें कुछ भी मिला नहीं 

जो मिला वो खुदा की बरकत है शुक्रिया अदा करो 


सेहत है घर बार है  परिवार और दोस्त मयस्सर है 

ये परवरदिगार की रहमत है शुक्रिया अदा करो

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"


Saturday, December 6, 2025

दिसम्बर

तुझसे जुदाई, तेरी याद और दिसम्बर 

एक तो इतने बुरे हालात और दिसम्बर 


याद बहुत आते है वो साथ बिताए पल

तेरे इश्क़ में डूबी रात और दिसम्बर 


ये इश्क़ मुकम्मल होना ही था उस रात 

वो आख़िरी मुलाक़ात और दिसम्बर 


सर्द हवायें, ठंडा कमरा, और हम तुम 

मेरे हाथों में तेरा हाथ और दिसम्बर 


ज़बसे हम बिछड़े हैं सब सूना सूना है 

सूना घर सूने दिन रात और दिसम्बर 

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Sunday, November 23, 2025

कुछ नहीं बदला

नजरिया, वक्त, हालात, दौर, कुछ नहीं बदला 

तेरी ज़रूरत बदल गई और कुछ नहीं बदला 


परिवर्तन प्रकृति का नियम है, झूठ कहते हैं 

वो आज भी है दिलों का चौर कुछ नहीं बदला 


वो हुस्न तब भी क़ातिल था आज भी क़ातिल है 

होठों से लेकर काजल की कोर कुछ नहीं बदला 


बदलना फ़ितरत है जमाने की खैर कोई बात नहीं 

हमने तो पैरहन के सिवा और कुछ नहीं बदला 

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए

लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए  दिलों में दर्द मेरी आँखों में समंदर आए  कितनी मुद्दत से हैं उम्मीद में दहलीज़ मेरी तू अपने पाँवों से इसे ...