Sunday, July 9, 2017

गाँव और शहर

हमारे घरों में अब मेहमां पुराने नहीं आते,
परिंदे भी अब घोसले बनानें नहीं आते |

जबसे रुख किया है शहर का हमने,
ख्वाब भी अलसुबह सुहाने नहीं आते |

सावन का हो महीना या नवरात्र निकल जाए,
अब हम कहीं मंदिर में जल चढाने नहीं जाते|

चाँद तारे रातों को मुंडेर पर साथ सोते थे,
अरसा हुआ हम सोने को छत पर नहीं जाते |

यारों से मिल बैठे अरसा बीत गया,
कुछ हम नहीं जाते, कुछ वो नहीं आते |

क्या हासिल किया हमने गावों को छोड़कर,
माँ बाप भी हमसे मिलने शहर को नहीं आते |

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

1 comment:

  1. Simply want to say your article is as astonishing. The clarity in your post is just excellent and i can assume you are an expert on this subject. Well with your permission let me to grab your feed to keep up to date with forthcoming post. Thanks a million and please continue the gratifying work. netflix login

    ReplyDelete

तुम्हारा गुस्सा

ये जो तुम जरा सी बात पर बेवजह,  बेहिसाब गुस्सा कर लेती हो, ये हुनर तुम्हें बचपन से आता था? या मेरा डर से पीला पड़ा चेहरा देखने की ख्वा...