Sunday, July 9, 2017

गाँव और शहर

हमारे घरों में अब मेहमां पुराने नहीं आते,
परिंदे भी अब घोसले बनानें नहीं आते |

जबसे रुख किया है शहर का हमने,
ख्वाब भी अलसुबह सुहाने नहीं आते |

सावन का हो महीना या नवरात्र निकल जाए,
अब हम कहीं मंदिर में जल चढाने नहीं जाते|

चाँद तारे रातों को मुंडेर पर साथ सोते थे,
अरसा हुआ हम सोने को छत पर नहीं जाते |

यारों से मिल बेठे अरसा बीत गया,
कुछ हम नहीं जाते, कुछ वो नहीं आते |

क्या हासिल किया हमने गावों को छोड़कर,
माँ बाप भी हमसे मिलने शहर को नहीं आते |

1 comment:

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