Sunday, July 9, 2017

ये शहर फिर शहर सा लगने लगा है (25/06/2017)

लग रहा है कुछ दीवाने आ गए है शहर में,
ये शहर फिर शहर सा लगने लगा है |

लगता है फिर कोई राज़ है उसके सीने में,
वो अब कुछ और शगुफ्ता रहने लगा है |

चाहूँ न चाहूँ हर वक़्त मुझको,
उसका ही ख्याल रहने लगा है |

वो दुनिया में न आया पर अभी से,
वो दिलो-दिमाग में रहने लगा है |

जबसे उसने ये खबर सुनाई है मुझको,
इन कंधो पे वजन कुछ बढ़ने लगा है |

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

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