Wednesday, February 15, 2017

ये घर महका महका हुआ है |

ये घर महका महका हुआ है,
तेरे आने का धोखा हुआ है |

मुझे तो इंतज़ार था ही तेरा,
ये बिस्तर भी बहका हुआ है |

अरसे से देखो तुम न आई,
तकिये का चेहरा उतरा हुआ है |

सीने पे तेरी दस्तक की चाह में,
दरवाजा खुद ही तरसा हुआ है |

बस आँख खुले और तुम आओ,
इस उम्मीद में दिल सोया हुआ है |

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"
22 Dec 2017 

No comments:

Post a Comment

जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा

एक अरसे तक वो मेरा मोहतरम रहा, जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा मैं उस दिन पहली बार माँ से झूठ बोला कईं महीनों तक मेरे दिल में ये गम रहा। म...