Friday, January 15, 2021

तेरे आने की उम्मीद ने सोने ना दिया

होनी को तो बहुत मंजूर था मगर होने ना दिया
उसकी दुवाओं ने मुझे मुन्तशिर होने ना दिया

बहुत ख़्वाबीदा सी लग रही है आंखें तुम्हारी
कुछ तो है जिसने तुम्हें शब भर सोने ना दिया

अजीब शक्श है और अजीब है इश्क़ उसका
हजार सितम किये मुझपे और रोने ना दिया

दुनिया के इस सहरा में भी साथ हैं हम तुम
कुछ तुमने मुझे कुछ मैंने तुम्हें खोने ना दिया

वो रात गोया एहतिज़ार के लम्हात सी गुजरी 
"मौन" तेरे आने की  उम्मीद ने सोने ना दिया

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

बिटिया

चलते चलते यकायक मुड़ जाएगी
में रुक गया तो वो भी रुक जाएगी

क्या सितम है घर की रौनक है जो
ये चिड़िया भी एक दिन उड़ जाएगी

उसकी अठखेलियाँ मेरी खुराक है 
ये ना देखूं तो धड़कन रुक जाएगी

मेरे हर मर्ज की दवा है ये बिटिया
ये चली गयी तो सांसे छूट जाएगी

"मौन" आखिर तू किस गुमान में है
ये दौलत तो एक दिन लुट जाएगी

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Friday, December 18, 2020

माने या ना माने तू

यूँ सबको ना सुनाए जा मेरे इश्क़ के फ़साने तू
इश्क़ तुझे भी था इस बात को माने या न माने तू ।

वो एक रात तेरे इंतज़ार में कैसे कटी क्या कहूँ
काश के मिलने आ जाती किसी काम के बहाने तू।

वो हिज़्र की रात कयामत की रात बनकर गुज़री
तुझे गाड़ी में बिठाने के बाद की बात क्या जाने तू।

जो उम्मीद थी तुमसे वही तो ग़म का सबब था
"मौन" कभी फुरसत में सुनती मेरे अफ़साने तू।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Thursday, December 17, 2020

जब तक तुम्हे कोई मुद्दा मिले तकरार के लिए।

उसकी इस सुर्खी-ए-रुख़सार के लिए
मैं एक गुलाब ले आया इज़हार के लिए।

और फिर मैंने इंतज़ार में हयात गुजार दी
उससे एक रोज नशे में किये करार के लिए।

मुफलिस को नहीं मतलब खूबी-ए-शै से
कीमत मायने रखती है खरीदार के लिए।

हमने दांव पर लगा दी सारी कमाई अपनी
उनसे अकेले चंद लम्हों की गुफ्तार के लिए।

उनसे एक डाल न काटी गयी बैसाखी बनाने को।
जिन्होंने जंगल काट दिए हथियार के लिए। 

ये सिक्कों की खनखनाहट किस काम की
तारीफ मायने रखती है फनकार के लिए ।

जुरअत-ए-ईमानी में मुफलिसी नसीब है
कभी खुशामद नही लिखी सरकार के लिए।

अपना खून पसीना बोकर अनाज उगाता है
कोई नहीं सोचता उस काश्तकार के लिए।

"मौन" इश्क़ की बातें कर लो और एक पहर
जब तक तुम्हे कोई मुद्दा मिले तकरार के लिए।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Saturday, November 28, 2020

खालीपन

शाम सवेरे खालीपन है,
 सुनी रातें खलती है।
मेरे दिल की बोझल शामें, 
रोज सवेरे ढलती है।

दूर हुए हैं जबसे उनसे, 
एक विरह की ही ज्वाला,
इस दिल में भी जलती है और, 
उस दिल में भी जलती है।
© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Thursday, November 26, 2020

चला आया

और फिर मैं उसे छोड़ कर वतन, चला आया,
की जैसे रूह को छोड़कर बदन, चला आया । 

उसकी खुशबू मेरे जिस्म से चली न जाए कहीं
सो मैं नहाया नहीं, ओढ़कर थकन, चला आया।

उसके खयालों से बाहर आना चाहा जब भी
एक झोंका, ले उसकी यादों का वजन, चला आया।

याद रख कर हर एक सामान साथ ले आया
पर छोड़ के सबसे अनमोल रतन, चला आया।

कहाँ वह नीम की डाली, वह पीपल की छांव
"मौन" यूँ छोड़ के आंगन का चमन, चला आया।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Friday, May 15, 2020

तुम्हारा गुस्सा

ये जो तुम जरा सी बात पर बेवजह, 
बेहिसाब गुस्सा कर लेती हो,
ये हुनर तुम्हें बचपन से आता था?
या मेरा डर से पीला पड़ा चेहरा देखने की ख्वाहिश में
कहीं से तालीम ली है तुमने?
जो भी हो, तुम्हें शायद नहीं मालूम, 
की मैं तो डर जाता हूँ तुमसे,
पर घर की हर एक चीज हंस देती है तुमपे,
तुम्हें इतनी खूबसूरती से गुस्सा करते देख कर।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

शुक्रिया अदा करो

खुदा की किस क़दर इनायत है शुक्रिया अदा करो  हम और तुम उसी की बनावट है शुक्रिया अदा करो ये जो दुख भरी जिंदगी है जिसका तुम्हें मलाल है  ये लाख...