Thursday, November 26, 2020

चला आया

और फिर मैं उसे छोड़ कर वतन, चला आया,
की जैसे रूह को छोड़कर बदन, चला आया । 

उसकी खुशबू मेरे जिस्म से चली न जाए कहीं
सो मैं नहाया नहीं, ओढ़कर थकन, चला आया।

उसके खयालों से बाहर आना चाहा जब भी
एक झोंका, ले उसकी यादों का वजन, चला आया।

याद रख कर हर एक सामान साथ ले आया
पर छोड़ के सबसे अनमोल रतन, चला आया।

कहाँ वह नीम की डाली, वह पीपल की छांव
"मौन" यूँ छोड़ के आंगन का चमन, चला आया।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

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गुस्सा, फ़िक्र और आंसू लिए देहलीज पे हाजिर देखा, मैं जब भी घर देर से लोटा, 'माँ' को  मुन्तज़िर देखा |                                ...