Monday, January 24, 2022

तुम्हें तो मालूम है जाना।


अब कितना टाइम है मेरे पास
जब से तुम गयी हो, 
मैं शाम को घर आकर
घंटा भर सोफे पे आराम करता हूँ
क्योंकि कोई भी तो नहीं 
जो ये कहे 
कि लो इन बच्चों को संभालो अब, 
सारा दिन मैंने संभाला है।
और मैं ये कहूँ 
की थक गया हूँ यार
आफिस में कितना काम होता है
तुम्हें तो मालूम है जाना।

बड़ी देर तक जागता हूँ मैं आजकल,
जबकि कोई नहीं है देर तक शोर मचाने वाला,
चूंकि इतने सन्नाटे का आदि नही रहा मैं अब
आदत सी हो गयी है तुम सबके शोर की
तुम्हें तो मालूम है जाना।

कहीं घर में कुछ बिखरा भी नहीं रहता अब
ना तो कोई सामान 
बेतरतीबी से रखा होता है
ना ही कोई बोतल या डब्बे का ढक्कन 
खुला मिलता है
आखिर किस चीज़ पे गुस्सा करूँ 
या चिढ़ जाऊं 
समझ नही आता
खैर चिढुंगा भी किसपे, 
तुम तो हो ही नहीं,
पर बिना गुस्सा किये 
मुझसे रहा भी तो नहीं जाता
तुम्हें तो मालूम है जाना।

और ये तुम्हारे होने की जो आदत डाल दी है तुमने
मैं अक्सर बाथरूम में 
नहाने घुस जाता हूँ बिना टॉवल लिए
और नहाने के बाद याद आता है 
कि तुम तो नहीं हो
ऐसी बहुत सी चीजें है जो अब याद नहीं रहती मुझे
तुम्हे तो मालूम है जाना।

तुम जो ऐसे चली जाती हो
एक एक दिन एक साल सा निकलता है मेरा
वैसे यूँ तो सब काम आता है मुझे
पर बिना तुम्हारी रोकटोक के 
हर काम बोरिंग लगता है
और मुझे बोरियत बिल्कुल पसंद नहीं। 
तुम्हें तो मालूम है जाना। 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Saturday, November 27, 2021

एक नज़्म

ये तो फिर ठीक है कि जीते हैं
पर ये कैसी जीत है 
कि इस जीत की कोई खुशी ही नहीं। 
हो भी क्यों, 
की ये खुशी 
किसी के गम का सबब क्यूँकर हो।
इससे तो अच्छा होता 
कि हार कर दिल को समझा लेते 
कम से कम ये बोझ तो दिल पर न रहता
बेहतर तो यही था 
कि इस बेअदबी का हिस्सा ही न बनते
पर ये बोझ भी इस दिल पे आना था 
और फिर इसको लेकर जीना था। 
ये तो यूँ है कि 
कोई माँ अपने बच्चे को पीट दे 
और फिर पछतावे में 
खुद ही रो रो कर आंखे सूजा ले।

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

जीत हार

सवाल जीत या हार का था ही नही
हमें दरअसल उलझना था ही नहीं। 

किसी का दिल दुखाकर खुशी पाऊं
ये मिज़ाज कभी अपना रहा ही नहीं।

हम खुद ही न समझ पाए कि हम
वो बन गए जो कभी चाहा ही नहीं।

जरा सी बात पर भिड़ जाने का शौक
जब था तो बहुत था, अब रहा ही नहीं

उसके आंसू मेरी आँखों से क्यूँ ना बहते
इतना पत्थर तो ये कलेजा था ही नहीं

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Tuesday, September 28, 2021

कैसे चला जाऊं इस आशियाने से

मैं इसलिए डरता हूँ कहीं जाने से
मैं पर्दा रख पाता नहीं जमाने से

खुली किताब हूँ मुझे पढ़कर लोग
बाज आते नही मुझे सताने से

मेरा चमन है मैंने इसे खून से सींचा
कैसे चला जाऊं इस आशियाने से

जरा संभल कर वो सय्याद है आखिर
बाज आएगा नहीं जाल बिछाने से

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Saturday, June 19, 2021

हद्द है

वो बिना इश्क़ सोगवार है हद्द है
और इश्क़ भी नागवार है हद्द है

जब पता ही था वो बेवफा है
क्यों ये दिल बेकरार है हद्द है

बस ख्वाब में मिलने की आस है 
और आंखों से नींद फरार है हद्द है

जिन रिश्तों की कसमें खायी थी
उन रिश्तों में भी दरार है हद्द है

कोई आसरा ही नहीं रहा लेकिन
एक उम्मीद बरकरार है हद्द है

"मौन" सच लिए खड़े हो यहाँ?
ये झूठ का बाजार है, हद्द है।

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

सच बताना

अच्छा सच बताना, 
क्या वहाँ भी तुम नींद में 
कंबल सरक जाने पर 
यह सोच कर वापस नहीं ओढ़ती, 
की मैं थोड़ी देर में ओढा ही दूंगा तुम्हे?
क्या तुम वहाँ भी अपने लिए रात को 
पानी की बोतल भरना भूल जाती हो? 
इस ओवरकॉन्फिडेंस में की 
मैं तो भर ही दूंगा।


अच्छा सच बताना
क्या तुम्हें वहाँ भी कोई
रोज सुबह याद दिलाता है 
की पानी में भिगोये हुए बादाम खाने है तुम्हें, 
जैसे मैं दिलाता था यहाँ।
और क्या तुम उनको खाने में 
वैसे ही नखरे करती हो,
जैसे यहाँ किया करती थी, 
और फिर क्या वहाँ भी तुम्हें कोई
जबरदस्ती खिलाता है,
जैसे मैं खिलाता था यहाँ। 

अच्छा सच बताना
क्या वहाँ भी तुम नहाने के बाद 
अपना टॉवेल सुखाना भूल जाती हो?
जैसे यहाँ कियाँ करती थी।

यहाँ ये सब करने वाला अब कोई नहीं, 
मैं अकेला ही 
घर की हर एक चीज से,
तुम्हारी शिकायत करता रहता हूँ 
और हर चीज 
कमबख्त 
तुम्हारा ही पक्ष लेती है 
और मैं हार जाता हूँ
जैसे पहले हार जाता था 
तुमसे, हर दिन।

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Wednesday, June 16, 2021

चलो खुद में कोई अना ढूंढे

चलो खुद में कोई अना ढूंढे
ना भी हो तो  बेपनाह ढूंढे

आज फिर वो हो गए खफा 
चलो खुद का कोई गुनाह ढूंढे

चलो आज ढूंढे कोई बेसहारा
फिर उसके लिए पनाह ढूंढे

तुम्हे जो वो बेइंतेहा इश्क़ था
वो मोहब्बत वाली निगाह ढूंढे

उनपे मुकदमा कर दें बेवफाई का
और फिर अपने लिए गवाह ढूंढे

उन निगाहों में अपने लिए प्यार
मिलना नहीं है, खामख्वाह ढूंढे

अपना गम गैरों को बताकर
कोई मुफ्त की सलाह ढूंढे

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

शुक्रिया अदा करो

खुदा की किस क़दर इनायत है शुक्रिया अदा करो  हम और तुम उसी की बनावट है शुक्रिया अदा करो ये जो दुख भरी जिंदगी है जिसका तुम्हें मलाल है  ये लाख...