Wednesday, February 10, 2021

जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा

एक अरसे तक वो मेरा मोहतरम रहा,
जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा

मैं उस दिन पहली बार माँ से झूठ बोला
कईं महीनों तक मेरे दिल में ये गम रहा।

मिरे हर शेर ने कितने दुश्मन बनाये मिरे
पर कलम में यही असनाफ़े-सुख़न रहा।

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

असनाफ़े-सुख़न = लेखन शैली

मैं उससे बिछड़ कर यूँ पिघलता रहा

एक अरसे से दिल में गम पलता रहा
मैं उससे बिछड़ कर यूँ पिघलता रहा

कोई दोस्त होता तो ये हाल न होता
मैं अकेला था यहां रोज जलता रहा

जो मिरा मुदर्रिस था वही दर्स था मिरा,
वो मुझे पढ़ाता रहा मैं उसे पढ़ता रहा।

वो सच जान कर रूठ ना जाए कहीं
रोज एक नयी कहानी मैं गढ़ता रहा

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

आधा आधा इश्क़

यूँ आधा इश्क़ मैनें और आधा उसने किया,
इंतख़ाब मैंने किया इख़्तिताम उसने किया। 

ये कैसे दाग नजर आ रहे है पैराहन पर मिरे
इतनी बेतरतीबी से मुझे कत्ल किसने किया

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Friday, January 15, 2021

तेरे आने की उम्मीद ने सोने ना दिया

होनी को तो बहुत मंजूर था मगर होने ना दिया
उसकी दुवाओं ने मुझे मुन्तशिर होने ना दिया

बहुत ख़्वाबीदा सी लग रही है आंखें तुम्हारी
कुछ तो है जिसने तुम्हें शब भर सोने ना दिया

अजीब शक्श है और अजीब है इश्क़ उसका
हजार सितम किये मुझपे और रोने ना दिया

दुनिया के इस सहरा में भी साथ हैं हम तुम
कुछ तुमने मुझे कुछ मैंने तुम्हें खोने ना दिया

वो रात गोया एहतिज़ार के लम्हात सी गुजरी 
"मौन" तेरे आने की  उम्मीद ने सोने ना दिया

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

बिटिया

चलते चलते यकायक मुड़ जाएगी
में रुक गया तो वो भी रुक जाएगी

क्या सितम है घर की रौनक है जो
ये चिड़िया भी एक दिन उड़ जाएगी

उसकी अठखेलियाँ मेरी खुराक है 
ये ना देखूं तो धड़कन रुक जाएगी

मेरे हर मर्ज की दवा है ये बिटिया
ये चली गयी तो सांसे छूट जाएगी

"मौन" आखिर तू किस गुमान में है
ये दौलत तो एक दिन लुट जाएगी

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Friday, December 18, 2020

माने या ना माने तू

यूँ सबको ना सुनाए जा मेरे इश्क़ के फ़साने तू
इश्क़ तुझे भी था इस बात को माने या न माने तू ।

वो एक रात तेरे इंतज़ार में कैसे कटी क्या कहूँ
काश के मिलने आ जाती किसी काम के बहाने तू।

वो हिज़्र की रात कयामत की रात बनकर गुज़री
तुझे गाड़ी में बिठाने के बाद की बात क्या जाने तू।

जो उम्मीद थी तुमसे वही तो ग़म का सबब था
"मौन" कभी फुरसत में सुनती मेरे अफ़साने तू।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Thursday, December 17, 2020

जब तक तुम्हे कोई मुद्दा मिले तकरार के लिए।

उसकी इस सुर्खी-ए-रुख़सार के लिए
मैं एक गुलाब ले आया इज़हार के लिए।

और फिर मैंने इंतज़ार में हयात गुजार दी
उससे एक रोज नशे में किये करार के लिए।

मुफलिस को नहीं मतलब खूबी-ए-शै से
कीमत मायने रखती है खरीदार के लिए।

हमने दांव पर लगा दी सारी कमाई अपनी
उनसे अकेले चंद लम्हों की गुफ्तार के लिए।

उनसे एक डाल न काटी गयी बैसाखी बनाने को।
जिन्होंने जंगल काट दिए हथियार के लिए। 

ये सिक्कों की खनखनाहट किस काम की
तारीफ मायने रखती है फनकार के लिए ।

जुरअत-ए-ईमानी में मुफलिसी नसीब है
कभी खुशामद नही लिखी सरकार के लिए।

अपना खून पसीना बोकर अनाज उगाता है
कोई नहीं सोचता उस काश्तकार के लिए।

"मौन" इश्क़ की बातें कर लो और एक पहर
जब तक तुम्हे कोई मुद्दा मिले तकरार के लिए।

© लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

कमाल करती हो

निगाहें फेर लेती हो तुम कमाल करती हो  जब तुम मेरे होंठों के आगे गाल करती हो । एक नजर देख लो  जिसको मुड़ कर तुम  बेइंतहा ग़रीब को भी मालामाल ...