एक अरसे तक वो मेरा मोहतरम रहा,
जुदा होकर भी उसके होने का भरम रहा
मैं उस दिन पहली बार माँ से झूठ बोला
कईं महीनों तक मेरे दिल में ये गम रहा।
मिरे हर शेर ने कितने दुश्मन बनाये मिरे
पर कलम में यही असनाफ़े-सुख़न रहा।
असनाफ़े-सुख़न = लेखन शैली
लो शाम हुई तेरी यादों के लश्कर आए दिलों में दर्द मेरी आँखों में समंदर आए कितनी मुद्दत से हैं उम्मीद में दहलीज़ मेरी तू अपने पाँवों से इसे ...
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