Thursday, December 8, 2022

सता लो चाहे जितना दर्द ना होठों से निकलेगा 

पर मैं रोया तो मैरा आँसू तेरी आँखों से निकलेगा


वक़्त है बुलंदी का तो कुछ भलाई के काम करो

वसूली का जो पैसा है वो बीमारों से निकलेगा 


पतवार जैसी भी हो नाविक में हिम्मत हो अगर 

सफ़ीना हर हाल में बाहर तूफ़ानों से निकलेगा 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Sunday, October 30, 2022

तुम्हें याद दिलाना है।

कहीं मिलो किसी दिन
तुम्हें याद दिलाना है

वो वादा जो तुमने खुद किया था,
और मैनें कहा था नहीं निभा पाओगी तुम।
वो दावा जो तुमनें खुद किया था,
की जिंदगी भर दोस्त बनकर रहोगी तुम।
वो वादा तुम्हें याद दिलाना है।

कहीं मिलो किसी दिन
तुम्हें याद दिलाना है

वो गर्मियों की दोपहरी का दिन 
जब तुम्हारी किताबें तुम्हें देने को 
घण्टों तुम्हारी बताई जगह पर खड़ा रहा मैं।
और तुम ना आई,
इसलिए कि तुम्हारा काजल खो गया था,
और बिना काजल लगाए 
तुम मेरे सामने कैसे आती।
वो काजल मेरे ही पास है 
तुम्हें वापस लौटाना है। 

कहीं मिलो किसी दिन
तुम्हें याद दिलाना है

वो जब तुम गुस्से में मुंह फुला कर 
खामोश बेठ जाती थी,
पर तुम्हारी आंखें और होंठ 
बराबर लड़ते रहते थे मुझसे।
जब तुम उदास होती तो 
तुम्हारी सहेलियाँ फोन करती मुझे,
की संभालो इसको, 
आप ही के बस की बात है ये।
एक आख़िरी बार तुम्हें गुस्सा दिला कर 
फिर मनाना है 

कहीं मिलो किसी दिन
तुम्हें याद दिलाना है

आज जब तुम किसी और के साथ 
बहुत खुश हो,
और बरसों तुम्हें मेरी याद नहीं आती,
जो कि अच्छा ही है।
पर हर जन्मदिन पर 
पहला फोन तुम्हारा आएगा जिंदगी भर,
ये वादा था तुम्हारा, 
और मेरा भी, 
मुझे तो याद है।
तुम्हें फिर याद दिलाना है।

कहीं मिलो किसी दिन
तुम्हें याद दिलाना है
©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

Wednesday, July 13, 2022

नवांकुर

मेरे घर के आंगन में 
पुराने केले के पेड़ की जड़ से फूटा 
एक नया अंकुर
अब बड़ा होकर
पेड़ बनने लगा है
साथ ही वह पुराना वृक्ष
किसी बुजुर्ग पिता की भांति
अपनी जगह से हटने लगा है
नवांकुर उसे अपने स्थान से हटाते हुए
उसकी जगह ले रहा है
जैसे कोई जवान बेटा 
वयस्क होने पर कारोबार में
अपने पिता की कुर्सी संभाल ले
और बेटे की प्रगति के लिए
पिता खुद अपनी जगह छोड़ दे
क्योंकि खेल कोई भी हो
बेटे से हार जाने की खुशी
जीत की खुशी से कहीं ज्यादा सुख़ देती है,
एक पिता को।
-लोकेश ब्रह्मभट्ट 'मौन'

Saturday, May 7, 2022

मातृ दिवस की शुभकामनाएं।

गुस्सा, फ़िक्र और आंसू लिए देहलीज पे हाजिर देखा,
मैं जब भी घर देर से लोटा, 'माँ' को  मुन्तज़िर देखा |
                   
                                         
-लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"
मुंतज़िर:  प्रतीक्षारत 

Tuesday, February 1, 2022

वो अलग जमाना था।

वो अलग जमाना था जब मैं और तुम मिले थे
ये वो जमाना ही नहीं

जब मेरी दुनियाँ तेरे रुख़सार के इर्द गिर्द
ही शुरू होकर खत्म हो जाती थी
और मैं बेतहाशा दीवानगी में
हर आहट में तेरे आने का 
झूठा भरम पाल कर चोंक उठता था।
ये जानते हुए भी की तू नहीं है।
और सचमुच तेरे आने पर तो मेरा चेहरा
जैसे किसी सूरजमुखी के फूल सा 
अनायास ही तेरी और मुड़ कर खिल जाता था
जैसे तू ना हो कोई सूरज की पहली किरण निकली हो
किसी काले बादल सा काजल लगा के।

वो अलग जमाना था जब मैं और तुम मिले थे।
ये वो जमाना ही नहीं

जब तुम्हारी हर छोटी से छोटी तकलीफ पर भी
पहला हक मेरा होता था। 
फिर चाहे उसमे कितना वक्त जाया हो 
और ये जानते हुए भी की जरा सी बात है 
परंतु तुम उस राई का पहाड़ बना कर 
मुझे उसमें शामिल करने का बहाना ढूंढ ही लेती थी
और मैं भी आदतन पूरी शिद्दत से लग जाता था 
उन गुत्थियों को सुलझाने में।

वो अलग जमाना था जब मैं और तुम मिले थे।
ये वो जमाना ही नहीं

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

 

Monday, January 24, 2022

तुम्हें तो मालूम है जाना।


अब कितना टाइम है मेरे पास
जब से तुम गयी हो, 
मैं शाम को घर आकर
घंटा भर सोफे पे आराम करता हूँ
क्योंकि कोई भी तो नहीं 
जो ये कहे 
कि लो इन बच्चों को संभालो अब, 
सारा दिन मैंने संभाला है।
और मैं ये कहूँ 
की थक गया हूँ यार
आफिस में कितना काम होता है
तुम्हें तो मालूम है जाना।

बड़ी देर तक जागता हूँ मैं आजकल,
जबकि कोई नहीं है देर तक शोर मचाने वाला,
चूंकि इतने सन्नाटे का आदि नही रहा मैं अब
आदत सी हो गयी है तुम सबके शोर की
तुम्हें तो मालूम है जाना।

कहीं घर में कुछ बिखरा भी नहीं रहता अब
ना तो कोई सामान 
बेतरतीबी से रखा होता है
ना ही कोई बोतल या डब्बे का ढक्कन 
खुला मिलता है
आखिर किस चीज़ पे गुस्सा करूँ 
या चिढ़ जाऊं 
समझ नही आता
खैर चिढुंगा भी किसपे, 
तुम तो हो ही नहीं,
पर बिना गुस्सा किये 
मुझसे रहा भी तो नहीं जाता
तुम्हें तो मालूम है जाना।

और ये तुम्हारे होने की जो आदत डाल दी है तुमने
मैं अक्सर बाथरूम में 
नहाने घुस जाता हूँ बिना टॉवल लिए
और नहाने के बाद याद आता है 
कि तुम तो नहीं हो
ऐसी बहुत सी चीजें है जो अब याद नहीं रहती मुझे
तुम्हे तो मालूम है जाना।

तुम जो ऐसे चली जाती हो
एक एक दिन एक साल सा निकलता है मेरा
वैसे यूँ तो सब काम आता है मुझे
पर बिना तुम्हारी रोकटोक के 
हर काम बोरिंग लगता है
और मुझे बोरियत बिल्कुल पसंद नहीं। 
तुम्हें तो मालूम है जाना। 

©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"

दिसम्बर

तुझसे जुदाई, तेरी याद और दिसम्बर  एक तो इतने बुरे हालात और दिसम्बर  याद बहुत आते है वो साथ बिताए पल तेरे इश्क़ में डूबी रात और दिसम्बर  ये इ...