मर्द का अपना कोई सपना नहीं होता
वो जीता रहता है अपनों की जिंदगी
और उनके सपने,
बचपन से जवानी तक पूरे करता है
माँ बाप के सपने,
फिर पूरे करता है बीवी के अरमान
और उसकी महत्वकांक्षाओं को,
पूरी करता है बच्चों की ख्वाहिशें,
और जीता हैं उनकी ख़ुशीयाँ
भूल जाता है इतने सब में
की कुछ सपने उसके भी थे कभी,
कोई बकेट लिस्ट बनायी थी उसने भी,
कईं शौक थे उसके जो बचा कर रखे थे
की जब कमाने लगेंगे तब पूरा करेंगे,
जब कमाने लगा तो पूरा करता रहा
बीवी-बच्चों की जरूरतें,
उनके शौक उनके सपने,
और इन्ही सब में गुम हो गए उसके ख़्वाब
जो पूरे ना हो पाये कभी,
मर्द का अपना कोई सपना नहीं होता ।
@लोकेश ब्रह्मभट्ट ("मौन" लोकेश)
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