ये घर महका महका हुआ है,
तेरे आने का कोई धोखा हुआ है |
मैं तो तेरा मुंतज़िर हूँ बरसों से,
बिस्तर भी बहका बहका हुआ है |
एक अरसे से देखो तुम न आई,
तकिये का भी चेहरा उतरा हुआ है |
सीने पे तेरी दस्तक की चाह में,
दरवाजा खुद ही तरसा हुआ है |
बस आँख खुले और तुम आओ,
इस उम्मीद में "मौन" सोया हुआ है |
तेरे आने का कोई धोखा हुआ है |
मैं तो तेरा मुंतज़िर हूँ बरसों से,
बिस्तर भी बहका बहका हुआ है |
एक अरसे से देखो तुम न आई,
तकिये का भी चेहरा उतरा हुआ है |
सीने पे तेरी दस्तक की चाह में,
दरवाजा खुद ही तरसा हुआ है |
बस आँख खुले और तुम आओ,
इस उम्मीद में "मौन" सोया हुआ है |
©लोकेश ब्रह्मभट्ट "मौन"
22 Dec 2016